*सोन नदी के प्रतिबंधित सेंचुरी क्षेत्र में जबरदस्त कथित खनन का ‘खेल’!*

*सोन नदी के प्रतिबंधित सेंचुरी क्षेत्र में जबरदस्त कथित खनन का ‘खेल’!*
•~ रुद्रा माइनिंग पर गंभीर आरोप, वन-खनन विभाग की निगरानी पर उठे सवाल
•~ प्रतिबंधित क्षेत्र में पोकलेन और नावों से बालू-मौरंग निकालने का आरोप, रात के अंधेरे में कथित खनन की गतिविधियां तेज होने का दावा

*इंडिया न्यूज़ लाइव टीवी संवाददाता अवधेश कुमार गुप्ता*

गुरमा,सोनभद्र। सोन नदी के प्रतिबंधित सेंचुरी क्षेत्र में कथित अवैध खनन को लेकर सवालों का तूफान खड़ा हो गया है। महलपुर क्षेत्र के अंतर्गत भगवा सोन नदी में मेसर्स रुद्रा माइनिंग कंपनी पर बालू-मौरंग के कथित अवैध खनन के गंभीर आरोप लगे हैं। स्थानीय लोगों का दावा है कि नदी में पोकलेन मशीनों और बड़ी नावों के सहारे खनिजों का दोहन किया जा रहा है। यदि ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं, तो मामला महज खनन नियमों के उल्लंघन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और विभागीय निगरानी की प्रभावशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगा।सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि संबंधित क्षेत्र में खनन प्रतिबंधित है, तो वहां कथित तौर पर भारी मशीनें और नावें कैसे पहुंचीं? क्या संबंधित विभागों को इसकी जानकारी नहीं है, या फिर निगरानी व्यवस्था में कहीं गंभीर चूक हो रही है? इन सवालों के जवाब अब ग्रामीण ही नहीं, बल्कि सोन नदी के संरक्षण को लेकर चिंतित लोग भी मांग रहे हैं।
*प्रतिबंधित क्षेत्र में कथित खनन, निगरानी तंत्र पर सवालों की बौछार*
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि सोन नदी में बालू-मौरंग निकालने के लिए भारी मशीनों और नावों का इस्तेमाल किया जा रहा है। उनका दावा है कि दिन के अलावा रात के अंधेरे में भी खनन गतिविधियां संचालित होने की आशंका है। नदी से निकाले गए खनिजों को किनारे लाकर ट्रकों और डंपरों के माध्यम से बाहर भेजे जाने की बात भी कही जा रही है।ग्रामीणों के इन आरोपों ने वन विभाग, खनन विभाग और जिला प्रशासन की निगरानी व्यवस्था को सवालों के घेरे में ला दिया है। हालांकि, अभी इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित कंपनी का पक्ष भी सामने आना बाकी है। ऐसे में मौके का निरीक्षण, खनन अभिलेखों की जांच और संबंधित अधिकारियों की रिपोर्ट के आधार पर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करना आवश्यक है।सवाल यह है कि जब खनन गतिविधियों के लिए सीमांकन, अनुमति और निर्धारित शर्तों का पालन जरूरी है, तो क्या संबंधित स्थल पर इन नियमों का पालन हो रहा है? यदि सब कुछ नियमानुसार है, तो विभागीय जांच में स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। और यदि नियमों का उल्लंघन हो रहा है, तो जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई में देरी क्यों होनी चाहिए?
*नदी की छाती चीरने का आरोप, पर्यावरणीय नुकसान की आशंका*
सोन नदी केवल बालू-मौरंग का स्रोत नहीं, बल्कि क्षेत्र की प्राकृतिक और जलीय पारिस्थितिकी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। नदी के संवेदनशील हिस्सों में अनियंत्रित खनन से उसके प्राकृतिक स्वरूप, जल प्रवाह, नदी तटों और जलीय जीवों के आवास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।ग्रामीणों ने चिंता जताई है कि यदि प्रतिबंधित क्षेत्र में नियमों के विरुद्ध खनन हो रहा है, तो इसका असर नदी और आसपास के पर्यावरण पर पड़ सकता है। विशेष रूप से वन्यजीव संरक्षण से जुड़े क्षेत्र में किसी भी खनन गतिविधि की वैधता और पर्यावरणीय प्रभावों की जांच बेहद जरूरी है।अब संबंधित विभागों को स्पष्ट करना चाहिए कि कथित खनन स्थल की स्थिति क्या है, वहां किन गतिविधियों की अनुमति है और क्या निर्धारित सीमाओं एवं शर्तों का पालन किया जा रहा है।
*पोकलेन और नावों के इस्तेमाल पर सवाल—किसकी निगरानी में चल रहा काम?*
मामले का एक अहम पहलू नदी में भारी मशीनों और नावों के कथित इस्तेमाल से जुड़ा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रतिबंधित क्षेत्र में ऐसी गतिविधियां चल रही हैं, तो इनकी जानकारी संबंधित विभागों तक पहुंचनी चाहिए।ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या खनन क्षेत्र का नियमित निरीक्षण किया जा रहा है? क्या खनन पट्टे की सीमाओं, स्वीकृत मात्रा और परिवहन संबंधी अभिलेखों की जांच हुई है? क्या संबंधित स्थल पर वन्यजीव संरक्षण से जुड़े प्रतिबंध लागू हैं, और यदि हैं, तो उनका पालन सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?इन सवालों का जवाब आरोप- प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि मौके की निष्पक्ष जांच और पारदर्शी विभागीय कार्रवाई से ही सामने आएगा।
*भारी वाहनों की आवाजाही से ग्रामीणों की परेशानी बढ़ने की आशंका*
महलपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में खनिजों की ढुलाई को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि भारी वाहनों की आवाजाही निर्धारित नियमों के विपरीत हो रही है, तो इससे सड़कों पर दबाव बढ़ने, सड़क क्षतिग्रस्त होने और दुर्घटनाओं की आशंका पैदा हो सकती है।ग्रामीणों ने मांग की है कि कथित खनन स्थल से लेकर परिवहन मार्ग तक की जांच कराई जाए। वाहनों के दस्तावेज, खनिज परिवहन से संबंधित प्रपत्र और निर्धारित नियमों के अनुपालन की पड़ताल की जाए, ताकि किसी भी प्रकार की अनियमितता सामने आने पर जिम्मेदारी तय की जा सके।
*तीन विभागों से सीधे सवाल—जवाबदेही तय होगी या मामला ठंडे बस्ते में जाएगा?*
सोन नदी के कथित अवैध खनन को लेकर अब निगाहें वन विभाग, खनन विभाग और जिला प्रशासन पर टिकी हैं।
*पहला सवाल:* यदि संबंधित क्षेत्र में खनन प्रतिबंधित है, तो वहां कथित तौर पर भारी मशीनों और नावों के इस्तेमाल की जांच कब होगी?
*दूसरा सवाल:* संबंधित खनन गतिविधियों की वैधता, पट्टे की शर्तों, सीमांकन और परिवहन अभिलेखों की जांच किस स्तर पर की गई है?
*तीसरा सवाल:* क्या वन्यजीव संरक्षण से जुड़े प्रतिबंधों और पर्यावरणीय नियमों के अनुपालन की पड़ताल कराई जाएगी?
*चौथा सवाल:* यदि जांच में नियमों का उल्लंघन मिलता है, तो संबंधित कंपनी और जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होगी या नहीं?
*पांचवां सवाल:* निगरानी में लापरवाही सामने आने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाएगी या नहीं?इन सवालों का उत्तर केवल आधिकारिक बयान से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, मौके के निरीक्षण और कार्रवाई के ठोस परिणामों से मिलना चाहिए।
*ग्रामीणों की चेतावनी—जांच नहीं हुई तो आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे*
स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने कथित खनन की निष्पक्ष जांच कराकर सच्चाई सामने लाने की मांग की है। उनका कहना है कि सोन नदी और उसके आसपास के संवेदनशील क्षेत्र के संरक्षण के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं होना चाहिए।ग्रामीणों ने मांग की है कि संबंधित स्थल का तत्काल निरीक्षण कराया जाए, खनन की अनुमति और निर्धारित सीमाओं की जांच हो तथा वन्यजीव संरक्षण से जुड़े नियमों के अनुपालन की पुष्टि की जाए। यदि किसी प्रकार का उल्लंघन सामने आता है, तो नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाए।ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो वे जिला स्तर पर आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
*अब प्रशासन की अग्निपरीक्षा*
सोन नदी के प्रतिबंधित क्षेत्र में कथित खनन को लेकर उठे सवालों ने प्रशासन के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती खड़ी कर दी है। अब देखना यह है कि संबंधित विभाग मौके पर पहुंचकर आरोपों की निष्पक्ष जांच करते हैं या मामला केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित रह जाता है।सोन नदी का संरक्षण, वन्यजीवों की सुरक्षा और खनन नियमों का पालन सुनिश्चित करना संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है। ऐसे में जरूरी है कि आरोपों की निष्पक्ष जांच हो, संबंधित कंपनी का पक्ष सामने आए और जांच में जो भी दोषी मिले, उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।


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