
*वही बारिश जो आसमान से आती है,बूंदों में गाती है, पहाड़ों से फिसलती है…..फिर भी सावन के पावन महीने मे सूखे हैं ताल – पोखरे*
*वही बारिश जो आसमान से आती है,बूंदों में गाती है, पहाड़ों से फिसलती है…..फिर भी सावन के पावन महीने मे सूखे हैं ताल – पोखरे*
•~ सिर्फ अन्नदाता ही नही’ जलाशय भी हो रहे इन्द्रदेव के कोपभाजन का शिकार
•~ लोगों की चिंताएं बढ़ जाती है जब गर्मी की भांति आसमान मे दिखने लगते हैं सूर्य देव
*इंडिया न्यूज़ टीवी लाइव संवाददाता अवधेश कुमार गुप्ता*
गुरमा,सोनभद्र।वही बारिश… वही बारिश जो आसमान से आती है,बूंदों में गाती है, पहाड़ों से फिसलती है, नदियों में चलती है, नहरों में मचलती है, कुंओ-पोखर से मिलती है, खपरैलों पर गिरती है, गलियों में फिरती है, मोड पर संभलती है, फिर आगे निकलती है वही बारिश यह बारिश अक्सर गीली होती है,इसे पानी भी कहते हैं। जी हां!सावन में इन्द्रदेव के कोपभाजन का शिकार सिर्फ अन्नदाता ही नही’ जलाशय भी हो रहे हैं। जिस महीने में ताल- पोखरे पानी से लबालब होने चाहिए, उस महीने में वह सूखे पड़े हैं। पानी भी है तो नाममात्र का। इससे सभी की चिंतायें बढ़ने लगी है। लोग आसमान में उमड़ते – घुमड़ते काले-कजरारे बादलों की ओर निहार रहे हैं। मगर उन्हें निराशा ही हाथ लग रही है ।उनकी चिंताएं तो और उस समय बढ़ जा रही है जब गर्मी की भांति आसमान में सूर्यदेव दिखने लग जा रहे हैं।
बताते चलें कि सावन का महीना भी सप्ताह भर हो गया। किन्तु अभी तक मेघ ऐसी बारिश नहीं किये जिससे धान की रोपाई पूरी तरह हो सके। यहीं नहीं ताल – पोखरे भी इस माह में सूखे पड़े हैं। इसमें पानी भी नहीं के बराबर है।जो थोड़ा- बहुत है भी वह सूखता जा रहा है। इस वर्ष अधिक मास की बात की जाए तो यह महीना सावन नहीं, बल्कि भादो माना जाएगा। लेकिन अभी तक इस इलाके में मूसलाधार बरसात नहीं हुई। जिस कारण प्राकृतिक पहाड़ी नाले पर आश्रित जनपद के अधिकांश ग्राम पंचायतों के आदर्श तालाब आज भी पानी के अभाव में सूखे पड़े हुए है।मानसून के शुरुआती दौर में हुई मामूली बरसात से इसमें जो कुछ पानी भरा भी था वह भी सूखता चला जा रहा है। नहरे खुली, पानी भी आया, मगर उक्त तालाब में पानी नहीं गया। नतीजन गाँवो के मुख्य तालाब आज भी पानी की कमी से सूखे का दंश झेलने को मजबूर है। ताल-पोखरों में पानी नहीं होने की वजह से पशु-पक्षियों को भी अपनी प्यास बुझाने के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। गाँव के बुजुर्ग बच्चालाल मौर्य, रामगती दुबे, भुवनेश्वर, तपेश्वर आदि कहते हैं कि इन्द्र भगवान कभी-कभी रूठ जाते हैं। अबके समय में काफी गलीमत है। पहले की स्थिति अधिक खराब थी। किसानों को अक्सर सूखे नहीं अकाल का सामना करना पड़ता था। पीने के पानी के लिए परेशानी उठानी पड़ती थी। हालांकि सावन के महीने में झमाझम पानी नहीं बरसना किसी को अच्छा नहीं लग रहा है। पानी के अभाव में धान की रोपाई भी बाधित है। कठिन परिश्रम कर वहीं’ किसान धान ही रोपाई कर रहे है जिनके पास सिंचाई का निजी साधन है। वर्षा ऋतु में भी तमाम गाँवों के सिवान धान की खेती के बिना विरान पड़े हैं। संबंधित किसानों के चेहर पर मायूसी नजर आ रही है।
*अच्छी बरसात नहीं हुई तो खिसकेगा जलस्तर !*
जानकारों की माने तो अगर अच्छी यानी झमाझम पानी नहीं बरसा तो जलस्तर नीचे की ओर खिसक सकता है। जिसके चलते पेयजल का भी संकट उत्पन्न हो सकता है। आम जनजीवन को अपनी प्यास बुझाने के लिए परेशान होना पड़ सकता है। जलाशयों में पानी नदारद होने के कारण पशु-पक्षियों को भी मुश्किले उठाती पड़ेगी। कुल मिलाकर बरसात (मौसम) का यदि हालात इसी तरह रहा तो भविष्य में पानी के लिए त्राहि -त्राहि मच सकता है ।











